
जो जीवन मैं जी रही थी उसे कभी मैने परखा ही नहीं , या यूं कहूं परखना भी होता है यह तो पता ही नहीं था।मुझे तो लगता था कि बस यही है जीवन जो परिस्थितियों के कारण बन गया है, जो चल रहा था उसमें चैन भी नहीं था।लेकिन आचार्य जी से जुड़ने के बाद वास्तविक जीवन क्या है? यह समझ में आया और लगता है कि जो जीवन जिया वो तो व्यर्थ चला गया लेकिन अब शेष जीवन बोध से ही जीना है।
















