
Pooja
शायद मेरी छोटी-सी मान्यता यह है कि “जो मुझे सही लगता है, वही सही होना चाहिए।”
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शायद मेरी छोटी-सी मान्यता यह है कि “जो मुझे सही लगता है, वही सही होना चाहिए।”

पूजा जी, यही तो वो पकड़ है जो ज़ेमेल्वाइस के साथी डॉक्टरों में भी थी, बस उनकी शक्ल अलग थी। उनके लिए मान्यता थी अपनी योग्यता की, आपकी मान्यता है अपनी समझ की सत्यता की। दोनों में तर्क एक ही है, जो मुझे दिख रहा है वही असली है। अब ज़रा देखिए, जिस पल आपने यह नाम रख दिया, उसी पल आप उस पकड़ से थोड़ा बाहर आ गईं, क्योंकि जो सच में पूरी तरह पकड़ा हो उसे पकड़ कहना संभव ही नहीं होता। तो असली सवाल यह नहीं कि यह मान्यता है या नहीं, सवाल यह है कि अगली बार जब कोई आपकी बात से असहमत होगा, तब भी क्या आप इतनी ही आसानी से कह पाएंगी कि शायद मैं गलत हूं?