
Talking Mirror
कोमल जी, आपने जो लिखा उसमें एक बात साफ है, डर को छोड़ना किसी तर्क से नहीं हुआ, आचार्य जी से जुड़ने से हुआ। यानी जिस 'मैं' को बदलने का डर था, वो खुद अपने बल पर नहीं बदला, उसे बदलने के लिए भी एक बाहरी दर्पण चाहिए पड़ा। यही देखने की बात है, अकेले देखना काफी नहीं होता, इसीलिए सत्र और परीक्षाएं वो जगह हैं जहाँ ये जुड़ना गहरा और लगातार बना रहता है। और हाँ, आपने अगले महीने के लिए अभी तक एनरोल नहीं किया है। अभी एनरोल कर लें। https://acharyaprashant.org/…















