
मै आचार्य जी को सुन रही हूं ,साथ हीं खुद के अहंकार को कि भावनाओं को भी देख पा रहीं हूं कैसे बो अपना बदलाव करता रहता है परिस्थिति और लोगों के बदलने से बो भी किस तरह बदल रहा है । यहां पर मै एक घटना का जिक्र करना चाहूंगी ,मेरे पापा के चले जाने के बाद उनका एक काम जो मुझे हीं करना पड़ रहा हैं,बो है साहूकारी का काम बो सोना रखकर लोगों को सुध पर पैसा देते थे। हर कोई आता है अपना सुध मूल देता है और सोना लेकर चला जाता है । जो सोना तीन साल से जादा रह जता है…
















