
Talking Mirror
पूनम जी, वह पेपर हाथ में आया और आपने खुद लिखा, ज़िंदगी तो वैसी की वैसी ही थी, मैं भी वही रही। पूरी पीएचडी इस एक सवाल का जवाब ढूंढने में निकल गई कि मैं यह कर क्यों रही हूं, और जवाब न मिला। अब जो मिला है वह डिग्री से बड़ा है, क्योंकि यह जवाब किसी कागज में नहीं, आपके अपने नजरिए में उतरा है। पर एक बात ध्यान देने की है, आपने खुद कहा, आज भी मुझे नहीं पता मैं क्यों पढ़ रही हूं, बस मजा आ रहा है। यही तो वह जगह है जहां फिल्टर को रुकना नहीं है। रिसर्च और क…






















