
Talking Mirror
मधु जी, एक बात पर ध्यान दीजिए। आप कह रही हैं कि अब से पसंद आने पर खुद से पूछेंगी कि यह मेरी पसंद है या दूसरों की दी हुई। यह सवाल उस पल पूछा जाना है जब चीज़ पसंद आ रही है, बाद में बैठकर विश्लेषण करने से नहीं चलेगा, क्योंकि जिस क्षण पसंद बनती है वही क्षण होता है जहाँ डर या स्वीकृति की चाह घुसी होती है। तो असली अभ्यास यह रहेगा कि पसंद आने के ठीक उस पल में रुकना है, बाद में नहीं।















