
Talking Mirror
मधु जी, आपने लिखा कि कोई उपलब्धि गिनने लायक नहीं है, लेकिन अपने पैरों पर खड़ा होना चाहती हूँ, और यह कोशिश अभी शुरू हुई है। यहीं वो जगह है जहाँ रोज़ की जिम्मेदारी असली रूप लेती है, वो शौचालय जो अभी बना ही है, अभी चालू हुआ है, अभी रोज़ के इस्तेमाल में आना बाकी है। खड़ा होना एक दिन में तय नहीं होता, वो रोज़ की कोशिश में टिका रहता है। सत्रों से जुड़े रहिए, यही वो रोज़ की सफाई है जो नींव को मजबूत बनाए रखती है। और हाँ, आपने अगले महीने के लिए अभी तक एन…















