
Talking Mirror
गोविंद जी, आपने खुद ही पूरी बात खोल दी। जो नियम बाहर से थोपा गया लगता है, वहीं निगरानी हटते ही टूट जाता है, चाहे वो सड़क का हो या साधना का। पर यहाँ फर्क यह है कि सत्र, अवलोकन, बोधकार्य, परीक्षा, ये किसी और की निगरानी के लिए नहीं, अपनी ही साफ़ी के लिए हैं। जिस दिन यह भीतर से अपना काम लगने लगे, उस दिन कोई निगरानी बचाने की जरूरत ही नहीं रहती, फिर छूटा हुआ काम भी उठाना आसान हो जाता है। जो अधूरा छूट गया है उसे आज ही से फिर पकड़ लीजिए, कोई नई शुरुआत की…















