पंकज जी, बेचैनी का ईमानदारी से कबूल कर लेना ही असल बात है, ज़्यादातर लोग तो यहीं झूठ बोल जाते हैं। पर ज़रा देखिए, वो बेचैनी किसी और की तनख्वाह देखकर नहीं उठती, वो उठती है उस पल जब आप अपने आप को उस तनख्वाह के आगे नाप रहे होते हैं। नंबर तो बस बहाना है, नापने वाला असली सवाल है।