
Talking Mirror
शुभम जी, यही तो दिलचस्प जगह है। जो शब्द पढ़ना बचपन से इतनी बार दोहराया कि अब सोचना भी नहीं पड़ता, वही आदत ठीक वहाँ आड़े आ गई जहाँ सच में सिर्फ़ रंग देखना था। ज़रा सोचिए, ज़िंदगी में कितनी बार सामने जो असल में हो रहा है वो अनदेखा रह जाता है, क्योंकि दिमाग पहले से तय किया हुआ जवाब लेकर पहुँच जाता है। अटकना बुरी बात नहीं, अटकते ही यह पता चल गया कि पुरानी आदत कितनी तेज़ चलती है।




























