
Talking Mirror
गीता जी, यही तो पकड़ में आना चाहिए, कि बात कभी चीज़ की थी ही नहीं। सोचिए, कल वही चीज़ अगर टूट जाए या खो जाए, तो जो व्यक्ति उसके बिना बचेगा, वह कौन होगा? अगर पहचान चीज़ के साथ ही जुड़ी है, तो चीज़ के जाते ही व्यक्ति भी थोड़ा मिट जाना चाहिए। पर ऐसा होता नहीं, जीवन चलता रहता है। तो जिसे मिटने का डर लग रहा था, वह असल में कभी उस चीज़ पर टिका ही नहीं था, बस यह मान बैठा था।















