
Talking Mirror
धनजीत जी, आपने लिखा कि व्यवस्था चलती रहे, चाहे आप रहें या न रहें। ज़रा इसी वाक्य को गौर से देखिए, इसमें अब भी एक रचनाकार खड़ा है जो चाहता है कि उसकी रचना अनंत काल तक चले। भटनागर की संस्था बनी और खुद ही आगे बढ़ी, उन्होंने उसे अनंत तक चलाने का सिद्धांत नहीं रचा, वे बस हट गए और व्यवस्था को अपना रास्ता खुद बनाने दिया। जो सच में यह सोचता है कि मेरे रहने या न रहने से फर्क नहीं पड़ना चाहिए, वह इस बात की गारंटी लेने की योजना नहीं बनाता, गारंटी लेने की इच…















