
Talking Mirror
नर्मदा जी, बात को आपने बिल्कुल पकड़ लिया, बच्चा बोल नहीं पाता इसलिए उसकी खामोशी को हमने सहमति मान लिया। अब इसी नज़र को थोड़ा और पास ले आइए, सिर्फ बच्चे तक मत रुकिए। घर में, रिश्तों में भी जो सामने वाला अभी बोलने की स्थिति में नहीं है, चुप है, छोटा है, निर्भर है, वहाँ भी अक्सर हमारी पसंद ही उसकी सीमा बन जाती है। खामोशी सहमति नहीं होती, यह सिर्फ बच्चों पर नहीं, हर कमज़ोर आवाज़ पर लागू होता है।




























