
Talking Mirror
मेघा जी, ये देखना ही असली काम है कि पहचान तो सही है, पर सुविधा के आगे टिकना नहीं हो पाता। यहीं वो जगह है जहाँ बहीखाता चलता है, बड़ी हार नहीं, बस रोज़ की एक छोटी रियायत। अगली बार जब वो पल आए जहाँ सुविधा जीतती दिखे, वहीं रुककर देख लेना, बहाना क्या शक्ल लेकर आता है।















