
क्योंकि सबने यही बताया होता है, हमने यही देखा होता है। इन सबका होना मतलब मेरा होना होता है। कभी एग्ज़ाम में अच्छे मार्क्स आए तो हम टॉपर, हर फ़ील्ड में जीते तो हम बढ़िया। अगर कभी मार्क्स कम आए तो लूज़र—यह हमारी पहचान बन जाती है। न जाने क्यों अंदर से लगता है, यह मैं हूँ। मैं वह हूँ, मैं अच्छा हूँ, मैं बुरा हूँ, मैं इमोशनल हूँ, मैं अग्रेसिव और गुस्सैल हूँ। यह सारी बातें होती हैं, लेकिन कुछ दिनों बाद या कुछ घटनाओं के बाद यह सब बदल जाता है। 🪞 जैसे मु…
















