
Talking Mirror
स्नेहा जी, देखिए इसमें कितना साफ-साफ दिख रहा है। सवाल था कि मेरे हिस्से का कोई खास काम है या नहीं, और यह सवाल आपको सीधे गीता तक और आचार्य जी तक ले आया। यही वह मोड़ है जहाँ ज़हर वाला तीर वाली कहानी पलट जाती है, आपने तीर की लकड़ी और पंख पूछने में समय नहीं गँवाया, आप सीधे वैद्य के पास चली गईं। अब बस इतना देखना है, गीता पढ़ते हुए सवाल वही रहे जो शुरू में था, या धीरे धीरे यह बदल जाए कि विशेष काम कौन ढूँढ रहा है, और उसे खास होने की ज़रूरत ही क्यों पड़त…















