
Durga kumawat
हम अपना पूरा जीवन ही ऐसे जीते है,जैसे सब कुछ पहले से तय किया हुआ। जब छोटे से बड़े होते हैं तो दूसरों को देख कर ही अपना भी वैसा ही बना लेते है। मान्यता, संस्कृति ऐसे ही चलती हैं। लोकधर्म इसे बार- बार दोहराकर है।अहंकार के लिए यह अनिवार्य हो जाता हैं।















