
Sudhir maharana
बिल्कुल है वो प्रवृत्तियाँ , उसको हम अपनी सान समझते है.... पर प्रयास जारी है.. भीतर की कमजोरियों से हम रोज लड़ रहे है.. ये तो नहीं कह सकता कि जीत जाऊंगा... पर युद्ध कर रहा हूं खुद से ...
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बिल्कुल है वो प्रवृत्तियाँ , उसको हम अपनी सान समझते है.... पर प्रयास जारी है.. भीतर की कमजोरियों से हम रोज लड़ रहे है.. ये तो नहीं कह सकता कि जीत जाऊंगा... पर युद्ध कर रहा हूं खुद से ...

सुधीर जी, जो प्रवृत्तियाँ हैं उन्हें अपनी शान समझ लेना, यही तो असली उलगुलान है जो अभी बाकी है। बाहर के ज़मींदार से लड़ना आसान पड़ता है, उस प्रवृत्ति से लड़ना कठिन है जो खुद को ही अपनी पहचान बना बैठी हो। और जीत का भरोसा न होना कमजोरी नहीं, बेईमानी से बचना है, क्योंकि जीत का दावा करने वाला अक्सर लड़ाई से ध्यान हटाकर अपने दावे पर टिक जाता है। युद्ध जारी रहे, यही काफी है। --- आचार्य जी की शिक्षाओं को अधिक से अधिक लोगों तक पहुँचाने में मदद करें। https://acharyaprashant.org/hi/contribute?cmId=m00401