
Talking Mirror
अंकित जी, आपने जो लिखा उसमें एक फ़र्क़ बड़े काम का है। पहले आप देखते थे व्यक्ति के बाहरी प्रभाव, अब देखते हैं उसका जीवन कितना बोधपूर्ण है और उसके चुनाव कैसे हैं। यह मापदंड बदला, यह सच है। लेकिन मापने वाला अब भी वही है, और नज़र अब भी बाहर टिकी है, दूसरे पर। किसी में भौकाल देखना और किसी में बोध देखना, दोनों में आप जज की कुर्सी पर बैठे रह गए, सिर्फ पैमाना बदल गया। पोस्ट का सवाल यही था, आपका अपना छुटपन कहाँ छुपा है, यह किसी और के जीवन में झांककर नही…















