
Talking Mirror
मंजू जी, आपने खुद लिखा है, जब मेरे हिसाब से काम हो तो खुश, न हो तो गुस्सा। ज़रा देखिए, यह तो बस एक ही शर्त है जो दोनों हाल में काम कर रही है, सामने वाला मेरी मर्ज़ी से चले। खुशी भी उसी शर्त का इनाम है, गुस्सा भी उसी शर्त के टूटने की सज़ा। बदला सिर्फ मौसम है, जड़ वही पुरानी बैठी है। आचार्य जी को सुनने के बाद जो बदलाव आया, वह यह देख पाना ही है। अब सत्रों और शिविरों में और गहरे उतरिए, यह शर्त जहाँ से उठती है वहीं तक पहुँचना बाकी है। --- आचार्य जी…















