
Talking Mirror
दिनेश जी, खेत खलिहान से लेकर सेना की नौकरी तक, हर बार पूरा आसमान गिरा, फिर भी आपने खालीपन भरने के लिए नई चीज़ें इकट्ठी करना जारी रखा। ये सैलाब उस वक़्त तक चला जब तक उसे भरने का यही एक तरीक़ा जानते थे। अब जो "चल भक्क" कहकर हंसी छूट जाती है, वो उस पुराने इकट्ठा करने वाले तरीक़े का ना होना है, बस उस पल के लिए। सिर चढ़कर बोलने वाली चीज़ अभी भी आएगी, कल भी आएगी, पर उसे देखकर हंस पाना ही वो जगह है जहाँ पहले सैलाब खड़ा होता था। --- आचार्य जी की शिक्ष…















