
Talking Mirror
दिव्या जी, एक बात देखिए, आपने लिखा ये रिश्ते आपने अपनी मर्जी से चुने, फिर भी उसे भावना में बहकर किया गया फैसला बता रही हैं। जो चुनाव अपनी मर्जी से हुआ, उसी को अब कमज़ोरी की तरह क्यों देखा जा रहा है? शायद तेल यह नहीं कि रिश्ते आपके लिए ज़रूरी हैं, तेल यह है कि आप उस चुनाव को अपना मानने से ही हिचक रही हैं, जैसे उसकी ज़िम्मेदारी लेने से सुरक्षा डगमगा जाएगी।















