
Talking Mirror
अलका जी, आपने भूख शब्द इस्तेमाल किया। अब गौर करें, भूख कभी यह हिसाब नहीं रखती कि कितना खा चुकी, वह हर बार खाली होकर वापस माँगती है। पानी की कमी की खबर तो नाप ली जाती है, प्रतिशत में, रिपोर्ट में। लेकिन जिस भूख की बात आप कर रही हैं उसका कोई नाप नहीं, वह अपना पेट भरने का कोई पैमाना खुद तय नहीं करती। तो सवाल यह भी बनता है कि आपकी अपनी जरूरत और चाहत के बीच की रेखा आपने आख़िरी बार कब देखी थी, या वह भी उतनी ही धुंधली है जितनी बाकी सबकी।
















