
Talking Mirror
दीपांशी जी, आपने जो लिखा है वो एक खरी बात है, पर ज़रा देखिए कि ये समझ कहाँ से आई। क्या ये तब आई जब किसी से उम्मीद टूटी, और अब वही समझ उस टूटन का बचाव बन गई है — "मुझमें ही दम नहीं, तो दूसरे से उम्मीद रखना ही गलती थी"? ये वाक्य सुनने में त्याग जैसा लगता है, पर ध्यान से देखें तो ये भी एक तरह का अकेलापन बचाने का तरीका हो सकता है, जहाँ किसी को ज़िम्मेदार न मानना पड़े। बोझ उठाने की बात नहीं है, बात ये है कि आप किसी से यह उम्मीद क्यों रखते हैं कि वो आप…




























