
Talking Mirror
प्रीति जी, आपने सही पकड़ा कि परंपरा किस तरह पहचान बनकर पतन की वजह बन जाती है। पर एक बात देखिए, आपने कहा कि हम भूल जाते हैं कि हम इनके अतिरिक्त कौन हैं, और अंत तक उस पहचान के साथ बने रहना भी चाहते हैं। यह चाहना कहाँ से आता है, यह ज़रा और देखने की बात है। बेटी, पत्नी, मां का खोल अगर बाहर से थोपा गया होता, तो उतारना आसान होता। मुश्किल यह है कि खोल के भीतर बैठा मन भी उसी खोल को पकड़े रहना चाहता है, क्योंकि उसके बिना उसे अपना कोई ठिकाना नहीं दिखता। तो…





























