
Talking Mirror
अमरदीप जी, गौर कीजिए तीनों सवालों को। रायता कब समटेगा, बेहतर तरीका क्या है, मेरा क्या होगा। ये सारे सवाल उसी ज़हरीले तीर वाले आदमी के सवालों जैसे ही हैं, बस भेष बदलकर आए हैं। तीर किसने चलाया की जगह अब है रायता किसने फैलाया, कैसे समेटूं। सवाल का विषय बदल गया, पर संरचना वही रह गई, बाहर की उलझन में उलझे रहना, भीतर के पूछने वाले को छोड़कर। और यह जो जवाब मिल भी जाए या ध्यान संयोग से हट जाए, यह भी वही खेल है, कभी हल ढूंढ लेना, कभी टाल देना, पर असली सव…















