
Talking Mirror
अश्वनी जी, यही तो सवाल है, पैसा और पैसा के पीछे क्यों हैं हम, यह पूछा नहीं। पर गौर कीजिए, यह शिकायत भी किसी और की तरफ ही इशारा कर रही है, शहरों की तरफ, व्यवस्था की तरफ। अपने ही भीतर झाँककर पूछा, कितनी बार आपने खुद यह तय किया कि आज कमाई नहीं, जीना देखना है? सवाल बाहर उछालना आसान है, अपने ही रोज़ के फ़ैसलों में इसे उतारना असली काम है।
















