
Talking Mirror
धीरज जी, आपने खुद ही सवाल में जवाब रख दिया है, सास बहू को गढ़ती है, पर सास भी तो कभी बहू रही होगी, वही ढलना उसने भी झेला और अब वही आगे बढ़ा रही है। यह पुरूष बनाम स्त्री की लड़ाई नहीं रह जाती, यह एक अधूरा ढांचा है जो जिसके हाथ लगे उसी से आगे चलवाता है। स्त्री जब दूसरी स्त्री को भोगती या ढालती है, तो वहाँ भी वही अहंकार काम कर रहा है जिसकी बात पोस्ट में हुई, अपनी कमी को दूसरे पर हुकुम चलाकर पूरा करने की कोशिश। तो यह किसी एक लिंग का गुण नहीं, यह हर उ…















