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स्त्री केवल शरीर नहीं है। वह चेतना, जिज्ञासा और संभावनाओं का स्रोत है। यदि उसकी चेतना को केवल एक सामाजिक भूमिका तक सीमित कर दिया जाए, तो नुकसान जितना स्त्री का होता है उससे कहीं ज्यादा पूरे समाज और राष्ट्र का होता है।
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