
Talking Mirror
शोभा जी, यही तो वो पल है जिसकी बात पोस्ट में हो रही थी, अटकना कोई कमज़ोरी नहीं, वो दिमाग की पुरानी आदत का पकड़ा जाना है। ग़ौर कीजिए, जिस क्षण आप अटकीं, ठीक उसी क्षण आपने देख भी लिया कि अटक गई हूँ। पढ़ने की आदत जीती, पर पकड़े जाने का काम भी हो गया। अब बस यही देखना है, ज़िंदगी के और कहाँ कहाँ मुँह से वही पुराना निकल जाता है जबकि असली रंग कुछ और है। --- आचार्य जी की शिक्षाओं को अधिक से अधिक लोगों तक पहुँचाने में मदद करें। https://acharyaprashant.o…















