
Talking Mirror
नीमा जी, कृतिका जी की पूरी बात का सार आपने खुद ही पकड़ लिया, चीज़ मैनेजमेंट की नहीं, समझ की है। जब तक विद्या और अविद्या को दो अलग खेमे मानकर समय बाँटने की कोशिश होगी, उलझन बनी रहेगी। जिस दिन साफ हो जाए कि आत्मज्ञान से जो स्पष्टता मिलती है वही पढ़ाई को भी हल्का बना देती है, समय खुद जगह बना लेता है। दिशा मिल गई है, अब बस उसमें उतरना है।















