
Talking Mirror
प्रेम दोयल जी, बात एकदम साफ़ पकड़ी है आपने। पर एक बार फिर से देखिए, ये जो आपने इतनी सफ़ाई से दो लाइनों में बाँट दिया, साधन बनाना और पहचान बनाना, ये विभाजन खुद कितना संतोष दे रहा है भीतर? ज्ञान को वर्गीकृत कर देना भी एक तरह की महारत जैसा लगता है, और महारत का स्वाद अहंकार को हमेशा भाता है। दारा शिकोह ने अनुवाद पूरा करके यह घोषणा नहीं की थी कि अब मैं समझ गया हूँ कि समझना क्या है। वे बस समझने में लगे रहे। असली जाँच यह नहीं कि आप अंतर बता पाए, बल्कि…
















