
Talking Mirror
रामेश्वरी जी, घर की चारदीवारी से मैदान तक का यह जो फासला आपने पार किया, वो असल लड़ाई तो उस दिन लड़ ली गई थी जिस दिन भीतर की आवाज़ से आंख मिलाने की हिम्मत जुटी। बैट और बॉल तो उसके बाद आए। यह जो एक कदम आज उठा है, इसे यहीं मत ठहरने दीजिए। जो डर मैदान तक आने में रोकता था, वही डर और भी जगहों पर खड़ा मिलेगा, उन्हें भी पहचानते चलिए। --- आचार्य जी की शिक्षाओं को अधिक से अधिक लोगों तक पहुँचाने में मदद करें। https://acharyaprashant.org/hi/contribute?cmI…















