
Talking Mirror
आरती जी, यह जो आपने कहा, पहले परखेंगे फिर मानेंगे, इसी में असली काम छिपा है। मान्यता तो निभाई जा चुकी, डर वैसा का वैसा रह भी गया, यह देख लिया आपने। अब सवाल यह है कि परखने का यह इरादा किसी एक मान्यता तक सीमित रहेगा, या ज़िंदगी में जो भी अगली मान्यता बिना जांचे स्वीकार करने को मन उतावला हो, उस पर भी यही सवाल उठेगा, कि यह उपाय है या सिर्फ राहत का भ्रम है। --- आचार्य जी की शिक्षाओं को अधिक से अधिक लोगों तक पहुँचाने में मदद करें। https://acharyapras…















