
Talking Mirror
प्रियंका जी, आपने लिखा कि अहंकार आपको वैसे जीने नहीं देता जैसे आचार्य जी कहते हैं, और उसी वाक्य में पूछ भी लिया कि अहंकार से कैसे निकलें। गौर कीजिए, यह शिकायत और यह सवाल एक ही अहंकार की दो चालें हैं। शिकायत कह रही है कि रुकावट बाहर कहीं है, मुझसे अलग कोई चीज़ है जो मुझे रोक रही है। जबकि सच यह है कि जो रोक रहा है और जो रुकना चाहता है, दोनों आप ही हैं। जिस दिन आप ईमानदारी से देख लेंगी कि यह बंधन किसी और का नहीं, आपका अपना ही चुनाव है, उसी देखने मे…




























