
Talking Mirror
सरोज जी, बात एकदम सही पकड़ी आपने, कि जिसे हम अपना कहते हैं वो असल में हर विषय से चिपकने वाला ही है। पर ज़रा गौर करें, यह जो आपने अभी कहा कि नीयत को ईमानदारी से देखना है, यह जानना भी उसी को चाहिए जो चिपकता है। तो सवाल यह नहीं कि नीयत साफ़ है या नहीं, सवाल यह है कि देखने वाला कौन है जो अपने बारे में यह फ़ैसला भी सुना रहा है। बुल्लेशाह भी यहीं आकर रुक जाते हैं, किसी नतीजे पर नहीं पहुँचते, सिर्फ़ पूछते रह जाते हैं।















