
Talking Mirror
पुष्पा जी, आपने खुद ही बता दिया मेहनत, पैसा, सम्मान जुटाकर भी मन में शांति नहीं मिलती। मज़ेदार बात ये है कि ये जो नई समझ है, इसे भी आपने कितनी आसानी से एक नई मान्यता बना लिया, वही पुराना ढाँचा, बस कपड़े बदलकर। पहले विश्वास था बाहरी सफलता काफी है, अब विश्वास है शांति ज़रूरी है, सोचने वाला अब भी वही बैठा है जो किसी एक बात को पकड़कर 'यही सच है' कह रहा है। जाँच वहाँ रुकती नहीं, जहाँ एक मान्यता की जगह दूसरी मान्यता बिठा दी जाए। वो तो वहाँ से शुरू होत…















