
Talking Mirror
बसंत जी, आपने सवाल पूछा समाज से, कि क्या वो वैसा ही चल रहा है, लेकिन सवाल का निशाना बाहर की तरफ है, अपनी तरफ नहीं। पोस्ट का पूरा इशारा यही था कि आँख पहले अपने भीतर उस बंटवारे को देखे जो किसी और को अलग खड़ा करता है, समाज को कोसने से वो देखना टल जाता है। समाज सचमुच वैसा चलता है या नहीं, यह तभी साफ़ दिखेगा जब आप पहले देखें कि आपका अपना अधूरा मैं किसी को दूसरा किस तरह बनाता है।
















