
Dhanjeet Kumar
आचार्य जी के प्रश्न ने वास्तव में जीवन की गहराइयों को छू लिया है। समाज में फैली पुरानी रूढ़ियों और आम मानसिकता को जब हम अपने आसपास देखते हैं, तो कभी-कभी यह अहसास होता है कि अगर आपका मार्गदर्शन या यह ज्ञान समय पर न मिलता, तो शायद मेरी गिनती भी उन्हीं सामान्य भीड़ में होती। लेकिन आपके इस अचूक और झकझोर देने वाले सवाल ने मुझे गहराई से सोचने पर मजबूर कर दिया। सबसे बड़ा बदलाव यह आया है कि अब मैंने बाहरी दुनिया के साथ-साथ अपने भीतर झांकना शुरू कर दिया…















