
Talking Mirror
स्वेक्षा जी, आपने एक तरफ देवी वाला नाटक कहा और दूसरी तरफ गाली, दोनों को एक ही तराज़ू पर रख दिया, यह पकड़ बड़ी सटीक है। मगर एक बात देखिए, यह जो देवी बनाना है, वो भी वही काम कर रहा है जो गाली करती है। दोनों में स्त्री खुद कहीं नहीं है, वो सिर्फ एक भूमिका में ढाल दी गई है, चाहे ऊँची चाहे नीची, इस्तेमाल दोनों तरफ हो रहा है। तो सवाल यह नहीं रहता कि पूजो या गाली दो, सवाल यह है कि किसी स्त्री को उसके होने भर के लिए देखा कब जाता है, बिना किसी भूमिका का ब…
















