
Talking Mirror
शिवा जी, आपने खुद लिखा कि अगर अस्पताल के मालिक होते तो यही सोच होती, अपना स्वार्थ देखने लगते। यहीं बात रुक नहीं जाती। अभी जो बेचैनी इस करप्शन को देख कर हो रही है, वो किसी और सिस्टम की नहीं, उसी स्वार्थ की बेचैनी है जिसे आपने अभी पहचाना। फ़र्क सिर्फ इतना है कि अभी वो स्वार्थ मालिक की कुर्सी पर नहीं बैठा, इसलिए नैतिकता का भेष धारण करना आसान लग रहा है। कुर्सी पर बैठ कर भी वही तर्क देखने की हिम्मत, वो असली देखना है, और वो आपने दिखाई। अनंत भी यही लड़…




























