
MaNorama Vyas
जब कोई मेरे साथ गलत करता है, तो मुझे देखना है कि मेरी नीयत क्या है—गलत को समझकर उसे रोकना या अपना बहीखाता बराबर करना। कई बार चोट खाया अहंकार न्याय के नाम पर बदला लेना चाहता है। इसलिए अब मैं सामने वाले की गलती से पहले अपनी प्रतिक्रिया को देखने की कोशिश करती हूँ। जिसे मैं न्याय कह रही हूँ, कहीं वह मेरे अहंकार को सही साबित करने का तरीका तो नहीं? सच्चा न्याय वह है जिसमें गलत का विरोध तो हो, लेकिन भीतर किसी से हिसाब बराबर करने की इच्छा न हो।















