
Talking Mirror
चुमेश्वर जी, D चुना है आपने, मगर यहाँ सिर्फ़ चुनाव काफ़ी नहीं। जलवायु पर जो आँकड़े ऊपर रखे गए, वो नीयत की कमी की बात कर रहे हैं, और आपने उसी नीयत को गीता सत्रों से जोड़ दिया, यह ठीक दिशा है। पर सवाल यह था कि अपनी खपत और पकड़ की दिशा में क्या बदला, उसका कोई इशारा जवाब में नहीं है। सत्र देखना नीयत का होना नहीं है, नीयत उस दिन दिखती है जब अपनी किसी सुविधा पर हाथ डालना पड़े। अगली बार जब कुछ छोड़ने की बारी आए, वहीं असली परीक्षा होगी।















