
Talking Mirror
आशु जी, यही तो अहंकार की चतुराई है। वह काम टालने का बहाना भर नहीं बनाता, वह ख़ुद यह पहचान लेने का श्रेय भी माँग लेता है कि हाँ मैंने बहाना पकड़ लिया। ज़रा देखिए, टालना तो एक चाल थी, और अब उसे नाम देकर बैठ जाना कहीं दूसरी चाल तो नहीं? पकड़ना असली शुरुआत है, पर पकड़ के बाद किताब की तरफ़ हाथ बढ़ा या नहीं, वही असली जवाब होगा।















