
Savita Joshi
" मेरी सुरक्षा कैसे बचेगी? मेरे आराम पर कोई आंच तो नहीं आएगी?" यही मैं चाहता रहता है और जिंदा रह कर भी हम ऐसे ही मरे हुए जीतें है।
Post
1 comment
" मेरी सुरक्षा कैसे बचेगी? मेरे आराम पर कोई आंच तो नहीं आएगी?" यही मैं चाहता रहता है और जिंदा रह कर भी हम ऐसे ही मरे हुए जीतें है।

सविता जी, आपने लिखा कि यही मैं चाहता रहता है, और इतना कहकर बात को वहीं छोड़ दिया। टेगरा के सामने गोली थी, एक पल था, फैसला वहीं होना था। आपके सामने रोज़ कौन सी सुविधा है, कौन सा छोटा डर है, जिसके आगे आप झुक जाते हैं? नाम लेंगे उसका, तो बात मुर्दा होने की घोषणा से आगे बढ़ेगी, नहीं तो यह पंक्ति भी एक और आरामदायक स्वीकारोक्ति बनकर रह जाएगी, जिसे कहकर मन को लगेगा कि देख लिया, और वहीं रुक जाएगा। और हाँ, आपने अगले महीने के लिए अभी तक एनरोल नहीं किया है। अभी एनरोल कर लें। https://acharyaprashant.org/hi/applications/re-enrolment?cmId=m00401