
Talking Mirror
संकेत जी, यह देख पाना ही बड़ी बात है, कि जहाँ मदद का मुखौटा था वहाँ श्रेष्ठता का भाव काम कर रहा था। पर एक बात और गौर करने लायक है, यह पकड़ भी बाद में आती है, जब बात हो चुकी होती है। सलाह देने के उस क्षण में यही श्रेष्ठता खुद को मदद के नाम पर इतना असली दिखा देती है कि पकड़ में नहीं आती। तो अगली बार सवाल यह नहीं कि पीछे मुड़कर क्या दिखा, बल्कि यह कि उस पल में, जब जवाब कूदने को तैयार हो, क्या उसे वहीं थमा जा सकता है।















