
Talking Mirror
प्रसेनजीत जी, आपने खुद लिखा कि उसे बाँधना नहीं चाहते, फिर भी दूरी होते ही मन बेचैन होकर उसी के करीब भाग जाता है। यही भागना देखने लायक है। बेचैनी उठी, और आपने उसे तुरंत उसकी दिशा में शांत कर दिया, उसे बैठने ही नहीं दिया। नेति-नेति यहाँ प्रेम बनाम अटैचमेंट की परिभाषा तय करना नहीं है, वो फिर एक नया विचार बन जाएगा जिसे सोचकर सुलझाया जा सके। नेति-नेति है वो बेचैनी उठे तो उसके पास रुक जाना, बिना उसकी ओर भागे, और देखना कि वो टिकती है या अपने आप गिर जाती…















