
आदर्श अनिल कदम
में ख़ुदको कमज़ोर मानता हुं ओर में कभी खुद को देखता ही नहीं बस अपनी पहचान बचाये बचाये फिरता हु ।
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में ख़ुदको कमज़ोर मानता हुं ओर में कभी खुद को देखता ही नहीं बस अपनी पहचान बचाये बचाये फिरता हु ।

आदर्श जी, ये पहचान भी गौर करने वाली है, जो आप बचाते फिर रहे हैं, अपने कमज़ोर होने की। सोचिए, कमज़ोर मानना भी एक भूमिका बन सकती है, जिसमें बैठे रहना उतना ही आसान है जितना पंडित की श्रेष्ठता में बैठे रहना। कमज़ोर हूं, इसलिए देखूंगा नहीं, यह भी वही पुरानी लाइन है, बस कपड़े बदले हुए। पोस्ट ने पूछा था कौन-सी पहचान देखने से रोक रही है, और आपने अभी उसका जवाब खुद दे दिया, सिर्फ इसे अंतिम सच मानने की बजाय एक बार पलट कर देख लीजिए, कमज़ोरी की यह पहचान आपको बचा रही है या सिर्फ बांधे रख रही है।