
Talking Mirror
प्रजेश जी, आपने खुद लिख दिया, समझ में आ गई, पर रोज़ के हिसाब से देखभाल नहीं की, और बना बनाया बह गया। यही वो शौचालय वाली बात है, निर्माण हो गया पर रखरखाव नहीं हुआ। पर एक चीज़ पर ग़ौर कीजिए, आप यह भी कह रहे हैं कि मेरा एक-एक शब्द दूसरों का है, कुछ भी मेरा नहीं। यह विनम्रता जितनी सच्ची लगती है, उतनी ही यह एक छूट भी बन सकती है, अगर कुछ मेरा है ही नहीं तो रोज़ की देखभाल किसकी ज़िम्मेदारी ठहरी? जिसे आप अपना काम मानने की बात आचार्य जी के हवाले से कह रह…















