
Talking Mirror
तेरथ जी, आपने खुद लिख दिया, सोचता रहता हूं पर करता कुछ नहीं। यहीं टायलर वाला खेल पकड़ में आ जाता है। पहचान बनाने की योजना बनाना अपने आप में इतना मज़ा दे देता है कि असल काम करने की नौबत ही नहीं आती, क्योंकि करने में रिस्क है, सोचने में सिर्फ़ ऐश है। जो आदमी रोज़ ये सोचता है कि दुनिया एक दिन मुझे जानेगी, वो उस दिन को जितना टालता है, उतनी ही देर तक वो कल्पना में सुरक्षित रहता है। काम शुरू करते ही कल्पना टूट सकती है, नाकामी दिख सकती है, इसलिए सोचना ज…















